श्रेया न्यूज़ शहडोल नीलू राठौर :- उमरिया। आमतौर पर दीमक का नाम सुनते ही लोगों के मन में घरों और फर्नीचर को नुकसान पहुंचाने वाली छवि उभरती है, लेकिन जंगलों की दुनिया में यही छोटे जीव प्रकृति के सबसे बड़े सफाईकर्मियों में गिने जाते हैं।
लकड़ियां, पत्तियां और अन्य जैविक पदार्थ धीरे-धीरे सड़ते हैं
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार पारिस्थितिकी तंत्र में दीमकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। जंगल में गिरने वाले मृत पेड़, सूखी लकड़ियां, पत्तियां और अन्य जैविक पदार्थ धीरे-धीरे सड़ते हैं।
पोषक तत्वों को पुनः मिट्टी में मिला देते हैं
दीमक इन्हें विघटित कर छोटे-छोटे कणों में बदल देते हैं और पोषक तत्वों को पुनः मिट्टी में मिला देते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और नई वनस्पतियों को बढ़ने के लिए आवश्यक पोषण मिलता है।
जंगल की मिट्टी को बनाते हैं उपजाऊ
बांधवगढ के खितौली रेंजर स्वस्ति श्री जैन बताते हैं कि जिन जंगलों में दीमकों की सक्रियता अधिक होती है, वहां की मिट्टी अधिक उपजाऊ और नमीयुक्त पाई जाती है। वनस्पति अपेक्षाकृत अधिक घनी दिखती है
दीमक मिट्टी के भीतर सुरंगें बनाते हैं, जिससे जमीन में हवा और पानी का प्रवाह बेहतर होता है। इसका सीधा लाभ पेड़-पौधों की जड़ों को मिलता है। यही कारण है कि बांधवगढ़ के कई हिस्सों में वनस्पति अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ और घनी दिखाई देती है।
दीमकों द्वारा बनाए गए मिट्टी के टीले भी जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा हैं। ये टीले कई छोटे जीवों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल बन जाते हैं। सरीसृप, उभयचर, छोटे स्तनधारी और अनेक प्रकार के कीट इन परित्यक्त टीलों में बसेरा करते हैं। गर्मी और वर्षा के मौसम में ये संरचनाएं कई जीवों को सुरक्षित वातावरण प्रदान करती हैं।
महत्वपूर्ण भोजन स्रोत
बांधवगढ़ के जंगलों में पाए जाने वाले भालू और इंडियन पेंगोलिन जैसे वन्यजीवों के लिए दीमक महत्वपूर्ण भोजन स्रोत भी हैं। अक्सर जंगल में भालुओं को दीमक के टीलों को खोदते देखा जा सकता है। वहीं पेंगोलिन अपनी लंबी जीभ की सहायता से दीमकों को खाकर जीवित रहते हैं। इस प्रकार दीमक खाद्य श्रृंखला का भी अहम हिस्सा बने हुए हैं।
प्राकृतिक संतुलन में सबकी भूमिका
वन अधिकारियों का कहना है कि जंगल में मौजूद हर छोटा जीव प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में योगदान देता है। दीमक भले ही आकार में छोटे हों, लेकिन उनका काम पूरे वन तंत्र को जीवित और स्वस्थ बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। बांधवगढ़ के जंगलों में सक्रिय ये सूक्ष्म जीव प्रकृति के ऐसे अनदेखे प्रहरी हैं, जो चुपचाप जंगल को नया जीवन देने में जुटे हुए हैं।
प्रकृति के मौन इंजीनियर
फील्ड डायरेक्टर डा अनुपम सहाय का कहना है कि वन रक्षकों और ट्रैकर्स के लिए भी ये टीले महत्वपूर्ण पहचान चिन्ह होते हैं। जंगल के भीतर दिशा पहचानने और वन्यजीवों की गतिविधियों को समझने में ये सहायक साबित होते हैं।
जंगल की जीवन प्रणाली का अभिन्न हिस्सा
कुल मिलाकर, बांधवगढ़ के दीमक टीले केवल मिट्टी की संरचनाएं नहीं, बल्कि जंगल की जीवन प्रणाली का अभिन्न हिस्सा हैं। ये प्रकृति के ऐसे मौन इंजीनियर हैं, जो बिना दिखाई दिए पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित और जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऐसा होता है जीवन
रेंजर स्वस्ति श्री जैन ने बताया कि रानी दीमक कुनबे की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य होती है। उसका मुख्य कार्य अंडे देना होता है। एक परिपक्व रानी प्रतिदिन हजारों अंडे दे सकती है। राजा रानी के साथ रहकर प्रजनन में सहयोग करता है। श्रमिक दीमक सबसे अधिक संख्या में होते हैं और भोजन जुटाने, सुरंग बनाने, बच्चों की देखभाल तथा पूरे टीले के निर्माण का कार्य करते हैं। वहीं सैनिक दीमक कॉलोनी की सुरक्षा करते हैं और दुश्मनों, विशेषकर चींटियों से रक्षा करते हैं।
मिट्टी, लार और जैविक पदार्थों से बने ये टीले कई फीट ऊंचे हो सकते हैं। इनके भीतर जटिल सुरंगें, भोजन कक्ष, शिशु पालन क्षेत्र और वेंटिलेशन प्रणाली होती है। यह संरचना अंदर के तापमान और आर्द्रता को नियंत्रित करती है, जिससे दीमक भीषण गर्मी और बारिश में भी सुरक्षित रहते हैं।
नई जगह पर नई कॉलोनी बसाते हैं
वैज्ञानिक मानते हैं कि इन टीलों की संरचना ने आधुनिक वास्तुकला को भी प्रेरित किया है। बरसात के मौसम में दीमकों का जीवन चक्र और भी रोचक हो जाता है। इस समय कुछ नर और मादा दीमकों के पंख निकल आते हैं, जिन्हें “उड़न दीमक” कहा जाता है। ये झुंड में बाहर निकलते हैं, उड़ान भरते हैं और फिर जमीन पर उतरकर अपने पंख गिरा देते हैं। इसके बाद नर और मादा नई जगह पर नई कॉलोनी बसाते हैं।







