शहडोल (सीमा सिंह) ” हमारे घर में सब ठीक था। ग्रेजुएशन के बाद मैं एमए के साथ सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था। अप्रैल 2022 में मेरे मां और पिता को हाथियों ने कुचल कर मार डाला। एक दिन में सारे सपने टूट गए। पढ़ाई छूट गई। घर की जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई।
ये कहते हुए ऋषिराज सिंह कंवर की आंखों में मायूसी और दर्द अब भी झलकता है। हाथियों के हमले ने उनकी पूरी जिंदगी ही बदल दी। इस साल 19 मई को शहडोल जिले में हाथियों ने तीन लोगों को कुचलकर मार दिया।
इस तरह की यह पहली घटना नहीं थी। बीते कुछ सालों में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे अनूपपुर, शहडोल और उमरिया जिले में ऐसी घटनाएं 6 साल में बढ़ी हैं। इस दौरान हाथियों के हमले से 28 लोगों की मौत हुई है।
हाथियों के हमले से इन सीमावर्ती जिलों के लोगों की जिंदगी कैसे बदल गई, हाथी अचानक इतने हिंसक और हमलावर क्यों हो रहे हैं… पढ़िए इस रिपोर्ट में..
शहडोल जिला मुख्यालय से करीब 70 किमी की दूरी पर बांसा गांव है। चारों ओर जंगल से घिरा यह गांव आदिवासी बाहुल्य गांव है। यहां एक दुकान में पूछताछ करने पर हमें पता चला कि गांव के लल्लू सिंह कंवर की मौत हाथियों के हमले में हुई थी।
एक ग्रामीण की मदद से हम उनके घर पहुंचे। घर के बरामदे में कुछ बच्चे खेल रहे हैं। वहीं दो महिलाएं बरामदे में कच्चे आम काट रही हैं। घर के पुरुष सदस्य बाहर थे। बुलाने पर आए। फिर बातचीत शुरू हुई।
पिता के मरने के बाद पढ़ाई छूटी, काम करना पड़ा
लल्लू सिंह के बेटे अजय सिंह कंवर ने बताया कि हम दो भाई और एक बहन हैं। घर से दो सौ मीटर दूर हमारी जमीन है, जिसमें बहुत सारे महुआ के पेड़ लगे हैं। पुरखों से हमारे घर कीआय का मुख्य साधन महुआ, तेंदूपत्ता और जंगल से मिलने वाली वन उपज है। थोड़ा-बहुत कोदो भी हो जाता है।
महुआ के समय मां पिताजी हमेशा वहीं पेड़ों के पास ही महुआ बिनने सूखने और उसकी रखवाली के लिए रहते थे। 6 अप्रैल 2022 को भी मेरे मां, पिताजी और मौसी वहीं थे। जब आठ हाथियों के झुंड ने उन तीनों को कुचल कर मार दिया।
उस समय मैं और मेरा छोटा भाई पढ़ाई ही कर रहे थे। हम पढ़ने में अच्छे थे।
मां-पिताजी चाहते थे कि हम पढ़-लिख कर सरकारी नौकरी करें, लेकिन उस दिन ने हमारी जिंदगी बदल दी। पढ़ाई छूट गई। हम छोटे- छोटे-मोटे काम करने लगे।
अजय सिंह कंवर लल्लू सिंह के बेटे
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वादे के बाद भी हमें नौकरी नहीं मिली लल्लू सिंह के छोटे बेटे ऋषिराज सिंह कंवर की पत्नी भारती सिंह कहती हैं कि हमारे पास महुआ के कई पेड़ हैं। अच्छा महुआ मिलता है, लेकिन जब से यह हाथी वाला हादसा हुआ है, तब से हम लोग वहां जाने में बहुत डरते हैं। पहले तो लोग महुआ के सीजन में वहीं पेड़ के पास रखवाली के लिए झोपड़ी बना लेते थे और रहते थे। अब तो शाम होने के बाद कोई जाता भी नहीं।
हमारे घर से तो लोग दोपहर में दो-तीन घंटे के लिए जाते हैं और शाम होने से पहले वापस आ जाते हैं। उतनी देर में जितना महुआ बीनने जा
पाते हैं, उतना ही घर ला पाते हैं। बाकी सब बर्बाद हो जाता है। जब मम्मी-पापा की मौत हुई कलेक्टर और कई अधिकारी घर आए। कई वादे किए, लेकिन हम लोगों को मम्मी-पापा का चार-चार लाख यानी कुल आठ लाख मुआवजा मिला।
दोनों भाई पढ़े-लिखे हैं। कलेक्टर नौकरी का वादा करके गई थीं, आज तक नौकरी नहीं मिली। सास-ससुर जिंदा होते तो हमारे परिवार की स्थिति अच्छी होती।
भारती सिंह
लल्लू सिंह की छोटी बहू
6 सालों में 28 लोगों की मौत हाथियों के हमले से हुई
पिछले 6 सालों में अनूपपुर, शहडोल और उमरिया जिले में हाथियों के हमलों से अब तक 28 लोगों की मौत हो चुकी है। इन तीनों जिलों में
औसतन चार लोगों की जान हर साल हाथियों के हमले से जा रही है।
हाथियों के आने के बाद खुशहाली गई सिर्फ डर बचा
सा के रहने वाले 50 वर्षीय भागीरथी सिंह कहते हैं कि पहले यहां खुशहाली थी। संसाधन कम थे, लेकिन जंगलों से हमारा गुजारा हो जाता था। 2022 के बाद जब से हाथी आए हैं तब से पूरे गांव में एक दहशत का माहौल है। लोग जंगल जाने में घबराते हैं। काम तो छोड़िए किसी इमरजेंसी में रात-बिरात गांव से बाहर शहर भी जाना हो तो बहुत समस्या हो जाती है।
महुआ फसल का बहुत नुकसान हुआ, लेकिन सरकार ने लोगों को कुछ नहीं दिया। जब हाथी आते हैं हम सभी अपने घरों के अंदर छिप जाते हैं। यहां कोई खास काम नहीं है। ज्यादातर लोग जंगल पर ही निर्भर हैं, लेकिन जब से हाथी जंगल में आए हैं तब से हम लोगों को पैसे की बहुत दिक्कत आ रही है, क्योंकि हम महुआ बीनने, तेंदूपत्ता तोड़ने में अब डरते हैं।
बांसा से लगभग 10 किमी दूर चितरांव गांव है। साल 2022 में हाथियों का हमला इस गांव में भी हुआ था। 6 अप्रैल को सुबह 6 बजे 65 साल के मोतीलाल अपनी 60 साल की पत्नी मोलिया बाई के साथ जंगल में महुआ बीनने गए थे। तभी हाथियों का हमला हुआ और दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।
मां-पिता की मौत के बाद अब कभी अकेले जंगल नहीं जाता
मोतीलाल के बेटे विनोद बसोर बताते हैं कि मेरे माता- पिता उस दिन सुबह से हमेशा की तरह महुआ बीनने गए थे। उन्हें किसी ने नहीं बताया की जंगल में हाथी हैं। वहीं हाथियों ने मेरे माता-पिता को रौंद कर मार डाला। हम जंगल वाले लोग हैं। हर तरीके से जंगल पर निर्भर हैं।
इस घटना के पहले हमारे जंगल में हाथी नहीं थे, लेकिन जब से यह घटना घटी है तब से पूरे क्षेत्र में एक डर का माहौल है। मैंने अपने मां-बाप की लाश देखी थी। उन्हें हाथियों ने इतनी बुरी तरह से मारा था कि डर से मैं अब कभी जंगल में अकेला नहीं जाता। रात में तो जंगल जाने का सवाल ही नहीं।
बहुत जरूरी होता है तो दिन में जाता हूं, वह भी कई लोगों के साथ। पता चल जाता है कि कहीं आसपास हाथी हैं तो मैं अपने घर से बाहर ही नहीं निकलता। यही हाल पूरे गांव के हैं। पता चला है कि ढोढा के पास हाथी ने तीन लोगों को मारा है। वह इलाका हमारे जंगल से बहुत दूर नहीं है। यहां से 40-50 किमी दूर ही होगा। अब गांव में दहशत और बढ़ गई है।
जिन गांवों में अब तक हाथी नहीं पहुंचे उन्हें भी डर
छत्तीसगढ़ से लगे अनूपपुर, शहडोल और उमरिया जिले के कई गांव हाथियों के आने के बाद से दहशत में हैं। बीते सालों में इन तीनों जिलों में जहां-जहां हाथियों के हमले हुए हैं। उनमें से ज्यादातर जगह हाथी पहली बार उस जगह पर पहुंचे।
इन जिलों में जहां अब तक हाथियों के हमले नहीं हुए हैं वहां भी दहशत का माहौल है। लोगों का कहना है कि हाथियों का अब कोई भरोसा नहीं, ना ही उनका कोई रास्ता है। पिछले सालों में जितने हादसे हुए हैं वहां भी पहले हाथी जाते नहीं थे, इसीलिए हम लोगों को भी यह डर सताता रहता है कि हाथी कभी भी हमारे घरों की तरफ भी आ सकते हैं।
गांव से 10 किमी दूर स्कूल, हाथियों के डर से पढ़ाई छोड़ रहे बच्चे
19 मई को हाथियों के हमले से मरने वाले तीन लोगों में एक महिला ढोढा की थी। इसी गांव की रहने वाली 18 वर्षी ललिया बैगा कहती हैं कि इस घटना के बाद गांव में डर का माहौल है। हमारा गांव तो जंगल के बीच में ही है। वन विभाग भी कुछ नहीं करता। हमारे गांव में आठवीं तक स्कूल है।
12वीं तक की पढ़ाई के लिए बच्चों को गांव से 10 किलोमीटर दूर खड्डा के स्कूल में जाना पड़ता है जो कि पूरा जंगली रास्ते से होकर जाता है।
15 जून से स्कूल खुलने वाले हैं, लेकिन इस घटना के बाद सारे बच्चे स्कूल जाने से भी डरते हैं। सरकार को कम से कम हमारे गांव में स्कूल की व्यवस्था करनी चाहिए। हाथियों के डर से तो बच्चे पढ़ाई ही छोड़ रहे हैं।
वन विभाग को लेकर लोगों में गुस्सा शहडोल जिले के रहने वाले कोटू कोल गुस्से में कहते हैं कि क्या हम लोग भूख से मर जाएं।
जंगल नहीं जाएंगे तो हमारा गुजारा कैसे होगा।
हम लोग तो बाप दादा के जमाने से यहीं रहते आए हैं। हाथी तो अभी कुछ साल पहले ही आए हैं। वन विभाग के लोग कभी हम लोगों को सूचना नहीं देते की जंगल में हाथी हैं जब लोग मर जाते हैं तब हम उन्हें बुलाते हैं। उनकी जिम्मेदारी है, उन्हें हमें बताना चाहिए।
अगर वन विभाग को जंगल में हाथी रखना है या कोई भी जानवर रखना है तो वह रखें। हमें कोई आपत्ति नहीं, लेकिन कम से कम हमारी सुरक्षा का तो ध्यान रखें।
कोटू कोल
प्रभावित ग्रामीण
[हर बार नई जगह हो रहे हाथियों के हमले डीएफओ तरुणा वर्मा कहती हैं कि यह छत्तीसगढ़ से लगा हुआ जंगल है। सामान्यतः हाथी छत्तीसगढ़ से होते हुए बांधवगढ़ की तरफ आते हैं। पिछले कुछ सालों में वह यहां बसने भी लगे हैं। यह पूरा क्षेत्र हाथियों के लिए नया क्षेत्र है। वैसे ही इन क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए भी हाथी नए हैं। फिर भी पिछले कुछ सालों में जिन रूट पर हाथी का मूवमेंट रहता है उन सभी जगह पर विभाग विशेष ध्यान रखता है, लेकिन कभी-कभी हाथी अपने झुंड से बिछड़ जाते हैं या किसी नई जगह पर चले जाते हैं। इस बार भी ऐसे ही घटना हुई।
यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। ज्यादातर आबादी जंगलों में रहती है या जंगलों के करीब रहती है। उनकी निर्भरता भी जंगलों पर है, तो चाहे महुआ का सीजन हो या तेंदूपत्ते का सीजन हो कई लोग जंगल में रहते हैं। विभाग जहां भी हाथियों का मूवमेंट होता है, उन गांव में मुनादी कर उसकी जानकारी लोगों को देता है।
हमने हाथी मित्र दल बना रखे हैं। अपने फॉरेस्ट के लोगों की समय-समय पर हाथियों से संबंधित ट्रेनिंग भी करते रहते हैं गांव वालों को भी इसकी जानकारी दी जाती है।
झुंड से 20 किमी और अकेले हाथी से 10 किमी दूर रहना चाहिए
छत्तीसगढ़ में 25 सालों से हाथी मित्र के रूप में काम करने वाले मंसूर खान कहते हैं कि जानवर और इंसान दोनों ही हमेशा से जंगल का हिस्सा रहे हैं। सामंजस्य से दोनों आराम से साथ एकसाथ रहते भी आए हैं। अभी जो परिस्थितियां पैदा हुई हैं वह चिंताजनक तो है, लेकिन थोड़ी समझदारी और मुस्तैदी से इसे रोका जा सकता है।
जब हाथी झुंड में होते हैं तो 20 किमी और जब अकेले हो तो 10 किमी के दायरे से लोगों को बाहर रहना चाहिए। सामान्य तौर पर हाथी शांत ही रहते हैं। अगर उनके रास्ते में कोई नहीं आएगा तो वो आराम से निकल जाते हैं।







