सीमा सिंह शहडोल -:
” मैंने एक करोड़ रुपए गंवाने के बाद पैसा वापस मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। जब आईटी कोर्ट ने बैंकों को पैसा वापस करने का नोटिस दिया तो फिर उम्मीद बंधी हैI
ये कहना है इंदौर के धीरज जायसवाल का। जिन्होंने साल 2023 में इन्वेस्टमेंट के नाम पर करीब 1 करोड़ 20 लाख रुपए गवां दिए थे। धीरज ने खुद ही अपना पैसा ट्रांसफर किया था इसलिए बैंकों ने कहा- ये वापस नहीं मिल सकता। बाद में पता चला कि जिन बैंक खातों में पैसा ट्रांसफर हुआ था, वो फर्जी थे यानी उनका केवाईसी (नो योर कस्टमर) वेरिफिकेशन सही तरीके से नहीं हुआ था।
दरअसल, साइबर फ्रॉड में ठगी गई रकम यदि ऐसे अकाउंट में ट्रांसफर होती है, जिनका बैंकों ने सही तरीके से वेरिफिकेशन नहीं किया है तो आईटी एक्ट की धारा 43 (ए) के तहत बैंक पैसा वापस करने के लिए जिम्मेदार होंगे। हाल ही में मप्र की आईटी कोर्ट ने इसी आधार पर दो ऐसे मामलों में बैंकों को नोटिस दिया है।
क्या है आईटी एक्ट की धारा 43 (ए), फ्रॉड का शिकार लोग कैसे कोर्ट की मदद ले सकते हैं? क्या डिजिटल अरेस्ट के मामलों में पैसा गंवाने वाले लोगों को भी कोर्ट से राहत मिल सकती है? इसे लेकर भास्कर ने आईटी एक्सपर्ट से बात की। आगे बढ़ने से पहले इन आंकड़ों पर नजर डालिए…
एमपी में 5 साल में साइबर क्राइम 125 गुना बढ़ा
साल ठगी गई राशि होल्ड राशि रिकवरी %
2021 11 करोड़ 70 लाख 6.38%
2022 45 करोड़ 2.15 करोड़ 4.76%
2023 200 करोड़ 14.66 करोड़ 7.44%
2024 285 करोड़ 36.06 करोड़ 9.34%
{राज्य साइबर पुलिस का आंकड़ा सितंबर 2024 तक}
ठगी गई राशि वापस क्यों नहीं मिल पाती?
इसे दो केस से समझिए। ये दोनों केस पिछले साल के हैं…
केस 1: 1.5 करोड़ रुपए 294 बैंक खातों में घुमाया
एक सरकारी अधिकारी के साथ शेयर ट्रेडिंग के नाम पर 1.5 करोड़ की ठगी की गई। अधिकारी ने साइबर पुलिस को इसकी शिकायत की। पुलिस ने जब इन्वेस्टिगेशन किया तो पता चला कि ठगी गई रकम को 294 बैंक खातों में ट्रांसफर किया गया था। ये पैसा पहली बार में 8 खातों में, दूसरी बार में 5… इस तरह से 13 बार में 294 बैंक अकाउंट्स में ट्रांसफर हुआ। इसी दौरान इसे निकाला भी गया।
केस2: 11 राज्यों के 150 खातों में ट्रांसफर हुआ पैसा
ये केस भी शेयर ट्रेडिंग के नाम पर 2.5 करोड़ के फ्रॉड से जुड़ा था। इसमें पैसा 20-20 लाख की किस्तों में गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के 12 बैंक खातों में ट्रांसफर हुआ।
इसके बाद यहां से 15-15 लाख रुपए केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा के 25 से ज्यादा बैंक खातों में ट्रांसफर हुआ। इन्हीं 11 राज्यों के अलग-अलग खातों में ये पैसा घूमता रहा और निकला जाता रहाI
किराए के और फर्जी खातों का हो रहा इस्तेमाल
साइबर लॉ एक्सपर्ट यशदीप चतुर्वेदी कहते हैं कि इन दोनों केस में सारे खाते या तो किराए के हैं या फिर फर्जी तरीके से खोले गए हैं, यानी खाता खोलने के लिए जो केवाईसी वेरिफिकेशन होना चाहिए, वो नहीं हुआ। जो लोग अपने खाते ठगों को इस्तेमाल करने के लिए देते हैं वो मनी म्यूल कहलाते हैं।
चतुर्वेदी के मुताबिक, घोड़े या गधे के हाईब्रिड बच्चे को म्यूल कहा जाता है। यानी जिस तरह गधे और घोड़े सामान ढोने के काम आते हैं, उसी तरह मनी म्यूल अपने बैंक अकाउंट में ये पैसा ढोते हैं। कुछ तो ऐसे लोग होते हैं, जो अनजाने में ही मनी म्यूल हो जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता कि उनके बैंक अकाउंट का गलत इस्तेमाल हो रहा है।
कुछ लोग पैसे के लालच में अपना अकाउंट किराए पर देते हैं, तो कुछ को लगता है कि वे ऐसा कर नौकरी कर रहे हैं। इससे फ्रॉड को बढ़ावा मिलता है।
यशदीप चतुर्वेदी
साइबर लॉ एक्सपर्ट
फर्जी खातों में ट्रांसफर पैसा वापस मिलने की क्या गारंटी?
चतुर्वेदी कहते हैं कि व्यक्ति साइबर फ्रॉड का शिकार दो तरीके से होता है-
पहला: ठगे जाने वाले व्यक्ति को पता नहीं होता इसमें ठगा जाने वाला व्यक्ति न तो ओटीपी शेयर करता है, न ही एटीएम कार्ड का इस्तेमाल करता है और उसके खाते से पैसा निकल जाता है, यानी उसने अपनी तरफ से ठगों को किसी भी तरह की इन्फॉर्मेशन नहीं दी। ऐसे केस में आरबीआई की गाइडलाइन के मुताबिक बैंक ठगी गई रकम को वापस लौटाने के लिए बाध्य है।
दूसरा: ठगे जाने वाला खुद दूसरे के अकाउंट में पैसा ट्रांसफर करता है
ये इन्वेस्टमेंट फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट के केस में होता है। इसमें व्यक्ति खुद ठगों के अकाउंट में पैसा ट्रांसफर करता है। ऐसे केस में बैंक पैसा वापस नहीं करता। बैंक की तरफ से जवाब होता है कि आपने खुद ही पैसा ठगों के अकाउंट में ट्रांसफर किया है। इसमें बैंक कहां से जिम्मेदार है?
डिजिटल अरेस्ट से 47 करोड़ ठगे, वापस मिले 72 लाख
जिला दर्ज केस फ्रॉड राशि पीड़ितों को वापस दिलाई राशि
भोपाल 12 38.20 करोड़ 14.33 लाख
इंदौर 3 3.31 करोड़ 39.91 लाख
उज्जैन 3 2.71 करोड़ 0
ग्वालियर 4 1.35 करोड़ 16.16 लाख
जबलपुर 3 1.25 करोड़ 0
विदिशा 1 15.14 लाख 1.98 लाख
कुल 26 46.97 करोड़ 72.38 लाख
सोर्स- विधानसभा में दी गई जानकारी
यहां प्रभावी होती है आईटी एक्ट-2000 की धारा 43 (ए)
साइबर लॉ एक्सपर्ट चतुर्वेदी कहते हैं- साइबर फ्रॉड का आधार ही बैंक अकाउंट होता है। साइबर ठग पैसा अपने अकाउंट में ट्रांसफर करवाते हैं। वो जिस अकाउंट का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे खोलने के लिए बैंक ने केवाईसी वेरिफिकेशन नहीं किया है तो ये आईटी एक्ट 2000 की धारा 43 (ए) का सीधे तौर पर उल्लंघन है।
इसमें कहा गया है कि कोई संस्था या कंपनी किसी सेवा को देने के लिए आपकी व्यक्तिगत संवेदनशील इन्फॉर्मेशन को हैंडल करती है। यदि वह अपनी सर्विस देने और जो सुरक्षा उपाय तय किए गए हैं, उन्हें लागू करने में लापरवाही बरतते हैं और इससे किसी व्यक्ति को नुकसान होता है तो उसकी भरपाई कंपनी या संस्था करती है।
चतुर्वेदी कहते हैं कि साइबर फ्रॉड में भी यदि ठगों को फर्जी और किराए के खाते न मिलें तो वह राशि निकाल ही नहीं सकते। फर्जी खाते के बिना साइबर फ्रॉड नहीं हो सकता। आरबीआई की गाइडलाइन है कि यदि किसी बैंक ने बिना प्रॉपर केवाईसी वेरिफिकेशन के खाता खोला है और इससे किसी को नुकसान होता है तो वह इसके लिए क्षतिपूर्ति का हकदार होगा I
यह धारा ठगी का शिकार व्यक्ति के बैंक को ही नहीं बल्कि जिस बैंक के अकाउंट में पैसा ट्रांसफर हो रहा है उसे भी काफी जवाबदेह बनाती है।
यशदीप चतुर्वेदी
साइबर लॉ एक्सपर्ट
फर्जी अकाउंट में ट्रांसफर पैसे को कैसे क्लेम कर सकते हैं?
यशदीप चतुर्वेदी के मुताबिक, इसके लिए आईटी एक्ट 2000 के तहत हर राज्य में आईटी कोर्ट यानी कोर्ट ऑफ एडजिक्यूटिंग ऑफिसर की स्थापना की गई है। इसके जज की जिम्मेदारी राज्य के आईटी डिपार्टमेंट के पदेन प्रमुख सचिव संभालते हैं।
कैसे करते हैं फैसले
- आईटी कोर्ट के जज पुलिस से जांच रिपोर्ट मांगते हैं। साथ ही संबधित बैंकों को नोटिस जारी करके उन्हें भी पक्ष रखने के लिए बुलाते हैं।
- पीड़ित और बैंकों का पक्ष सुनने के बाद तय किया जाता है कि पैसा बैंक की गलती से गया या नहीं।
- बैंकों की ओर से डेटा की सुरक्षा में कमी पाए जाने पर उपभोक्ता को हुए नुकसान की भरपाई का कोर्ट निर्णय देता है।
आईटी कोर्ट में कैसे कर सकते हैं अपील
- वल्लभ भवन -1 की पांचवीं मंजिल पर सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग में कोर्ट आफ एडजिक्यूटिंग ऑफिसर का दफ्तर है।
- यहां साइबर फ्रॉड के शिकार लोग मामला दर्ज करा सकते हैं।
- सायबर लॉ एक्सपर्टस की मदद से भी इस कोर्ट में प्रकरण भेजा जा सकता है।
MP की आईटी कोर्ट में 13 मामले पेंडिंग
अब तक आए मामले – 48
फैसला सुनाया-35
पेडिंग-13
आईटी कोर्ट ने दो केस में बैंकों को दिए नोटिस
केस 1: इन्वेस्टमेंट फ्रॉड में गवां दिए 1 करोड़ रुपए
ये मामला इंदौर के रहने वाले धीरज जायसवाल के साथ हुआ। धीरज कहते हैं कि मैं फॉर्मा कंपनी में था। कोविड के बाद कंपनी ने कहा कि 55 साल से ज्यादा उम्र वालों को रिटायरमेंट का ऑप्शन देंगे। मैंने रिटायरमेंट ले लिया। मुझे अच्छा-खासा पैसा मिला। मैंने सोचा कि अब इन्हें सही जगह इन्वेस्ट करूंगा तो जो रिटर्न मिलेगा, उससे जिंदगी बढ़िया चलेगी।
मैंने यूट्यूब पर शेयर मार्केट इन्वेस्टमेंट से जुड़े वीडियो देखे। नवंबर 2023 में मुझे सोशल मीडिया पर इन्वेस्टमेंट का एक पेज दिखाई दिया।
इसमें एक वॉट्सएप ग्रुप पर जुड़ने के लिए कहा था। मैं इससे जुड़ गया लेकिन सतर्क था। मैंने पहले कुछ हजार का इन्वेस्टमेंट किया। इसमें 5 पर्सेट का इजाफा हो गया।
इसके बाद वो लोग मेरा भरोसा जीतते गए और इस तरह मैंने ज्यादा मुनाफे के लालच में 1 करोड़ इन्वेस्ट कर दिए। एक दिन पूरा पैसा चला गया।
केस2: 20 हजार इन्वेस्टमेंट के गंवाए सवा करोड़
भोपाल की हरप्रीत कौर हाउस वाइफ हैं। पति बड़ी कंपनी में अधिकारी हैं। परिवार की जिम्मेदारियां कुछ कम हुईं तो हरप्रीत ने सोचा कि परिवार की इनकम बढ़ाने में मुझे भी साथ देना चाहिए। पति ऑफिस तो बच्चे पढ़ाई में बिजी रहते। इस बीच हरप्रीत ने यूट्यूब और सोशल मीडिया पर इंवेस्टमेंट के वीडियो देखने शुरू किए।
एक पेज पर उन्हें लगा कि इनके सिखाने का तरीका बहुत सरल है और इनकी मदद से मुझे इंवेस्टमेंट करना चाहिए। हरप्रीत ने पति को यह
बात बताई तो पहले उन्होंने इन चक्करों में नहीं पड़ने को कहा लेकिन फिर सहमति बनी कि पहले 10-20 हजार से लगाकर सीखते हैं। कुछ हुआ भी तो मामूली सा नुकसान ही होगा।
इसके बाद हरप्रीत को हर इन्वेस्टमेंट पर मुनाफा मिलने लगा तो उन्होंने एक मुश्त राशि इन्वेस्ट की और साइबर फ्रॉड का शिकार हो गईं। इस तरह हरप्रीत ने सवा करोड़ रुपए गवां दिए।
RBI का बैंकों के लिए नियम
रिज़र्व भारतीय भRESERVE BANK OF INDIA
केवल आधार कार्ड नहीं देखना है, बल्कि कस्टमर की केवायसी (थंब इंप्रेशन, आधार वैरिफिकेशन, ऐड्रेस वैरिफिकेश) जरूरी।
डिजिटल केवायसी वाले अकाउंट में केवल 1 लाख रु. ट्रांजैक्शन की इजाजत ।
कॉर्पोरेट अकाउंट खोलने के लिए कंपनी का रजिस्ट्रेशन जरूरी। बैंक को कंपनी का फिजिकल वैरिफिकेशन करना भी जरूरी।
आईटी कोर्ट ने बैंकों को दिया नोटिस ये दोनों ही मामले आईटी कोर्ट में पेश किए गए।
आईटी कोर्ट के रीडर वरूण प्रताप सिंह बताते हैं कि कोर्ट ने आईटी एक्ट 2000 की धारा 43 (ए) में इन मामलों को न केवल मंजूर किया बल्कि जिन बैंकों के फर्जी खातों में पैसा ट्रांसफर हुआ था, उन्हें नोटिस भी दिया है। हरप्रीत कौर की याचिका पर कोटक महिंद्रा बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, फेडरल बैंक और यूको बैंक को नोटिस दिया है।
वहीं, धीरज जायसवाल की याचिका पर इंडसइंड बैंक, आईडीएफसी बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और फेडरल बैंक को नोटिस थमाया गया है।
इन बैंकों के प्रतिनिधियों को आईटी कोर्ट में पेश होकर जवाब देने को कहा गया है। बैंक लिखित जवाब भी भेज रहे हैं, जिसके आधार पर आईटी कोर्ट याचिका पर निर्णय लेगा।
दो मामलों में आईटी एक्ट की धारा 43 (ए) के तहत बैंकों को नोटिस दिए हैं। नियम न मानने पर बैंकों को कार्रवाई के दायरे में लाते हुए निर्णय दिए जाएंगे।
संजय दुबे
एसीएस, आईटी विभाग
चेन्नई और महाराष्ट्र के आईटी कोर्ट दे चुके फैसले
मप्र की आईटी कोर्ट ने पहली बार धारा 43(ए) के तहत नोटिस जारी किए हैं। चेन्नई और महाराष्ट्र के एडजिक्यूटिंग ऑफिसर इस तरह के नोटिस दे चुके हैं। चेन्नई में थामस राजू बनाम आईसीआईसीआई बैंक, अन्ना नगर शाखा केस में बैंक ने बिना केवाईसी वेरिफिकेशन के फर्जी खाता खोला था। एडजिक्यूटिंग ऑफिसर ने बैंक की जिम्मेदारी तय करते हुए आवेदक को 1 लाख 62 हजार 800 रुपए क्षतिपूर्ति के आदेश दिए।
इसी तरह महाराष्ट्र के एडजिक्यूटिंग ऑफिसर ने मेसर्स श्रीनिवास सिंह प्राइवेट लिमिटेड बनाम आईडीबीआई बैंक केस में फैसला देते हुए कंपनी को 12 लाख रुपए के नुकसान को 12 प्रतिशत ब्याज के साथ चुकाने के निर्देश बैंक को दिए थे।







