श्रेया न्यूज़ द्रोपती धुर्वे शहडोल :- शहडोलः मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और फाइलेरिया जैसी बीमारियां आज भी जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। इन रोगों के प्रमुख ‘वाहक मच्छर हैं, जिनके नियंत्रण के लिए अब तक मुख्य रूप से रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता रहा है। हालांकि रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से पर्यावरणीय असंतुलन और कीटनाशक प्रतिरोध जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे में जबलपुर स्थित शासकीय मोहनलाल हरगोविंददास गृह विज्ञान एवं विज्ञान महिला महाविद्यालय जबलपुर के प्राणीशास्त्र विभाग में कार्यरत शहडोल जिले के ब्यौहारी कस्बा निवासी डा. अर्जुन शुक्ला ने एक अभिनव शोध के माध्यम से यह जांचने का प्रयास किया कि क्या विशेष ध्वनि-आवृत्तियां मच्छरों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं। यह अध्ययन मच्छरों को मारने के बजाय उनके व्यवहार को समझने व नियंत्रित करने की दिशा में किया गया है।
इस शोध में मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण प्रजातियों क्यूलेक्स और एनाफिलीज के वयस्क नर एवं मादा मच्छरों पर नियंत्रित वातावरण में प्रयोग किए गए। सामान्य पहचान के अनुसार क्यूलेक्स मच्छर दीवार पर सीधे बैठता है, जबकि एनाफिलीज़ बैठते समय अपने शरीर को तिरछे कोण में रखता है और उसका पिछला भाग ऊपर उठा रहता है।डा. अर्जुन ने बताया कि मच्छर मनुष्यों की तरह कानों से ध्वनि नहीं सुनते, बल्कि उनके एंटीना में स्थित जान्स्टन आर्गन नामक संरचना कंपन को महसूस करती है।
इसी आधार पर भारतीय संगीत की सरगम से जुड़ी 392 हर्ट्ज, 440 हर्ट्ज के समीप और 494 हर्ट्ज आवृत्तियों का चयन किया गया और कैसियो की बोर्ड के माध्यम से इन ध्वनियों को उत्पन्न कर मच्छरों के व्यवहार का सूक्ष्म अवलोकन किया गया। रिसर्च के दौरान पाया गया कि 440 हर्ट्ज की ध्वनि पर मच्छरों में सबसे अधिक व्यवहारिक परिवर्तन देखा गया। वे अधिक बेचैन हुए, अनियमित ढंग से उड़ने लगे और कम समय के लिए स्थिर बैठे। नर मच्छर मादा की तुलना में अधिक संवेदनशील पाए गए और एनाफिलीज़ प्रजाति में यह प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक स्पंष्ट रहा। अर्जुन ने बताया कि उनके दादाजी को एक विशेष प्रकार की तेज और ध्वनि सुनकर असहजता चिड़चिड़ापन महसूस होता था। इसी अनुभव ने उनके मन में यह प्रश्न उत्पन्न किया कि क्या अलग-अलग जीवों पर भी विशिष्ट ध्वनियां अलग प्रकार से प्रभाव डाल सकती हैं। इसी जिज्ञासा के चलते उन्होंने विभिन्न आवृत्तियों पर प्रयोग किए और पाया कि लगभग 440 हर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी पर मच्छरों के व्यवहार में स्पष्ट बेचैनी और अनियमितत्ता देखी गई।







