श्रेया न्यूज़ शहडोल नीलू राठौर :- धरमपुरी। न्यायालय में झूठी गवाही देकर न्याय व्यवस्था को गुमराह करने के मामले में धरमपुरी कोर्ट ने एक सख्त फैसला सुनाया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी विवेक जैन ने रजानगर धरमपुरी निवासी 38 वर्षीय आयशा बी को 3 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। महिला को भारतीय दंड संहिता की धारा 193 के तहत दोषी पाए जाने पर जुर्माने से भी दंडित किया गया है।
क्या था पूरा मामला
आयशा बी ने 20 अप्रैल 2018 को थाना धरमपुरी में सलीम खान, फिरोज खान, इरफान खान, फोदू उर्फ निजामुद्दीन, फारुख पठान और रफीक खान के खिलाफ घर में घुसकर बार-बार सामूहिक बलात्कार करने और जान से मारने की धमकी देने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने रिपोर्ट के आधार पर सभी छह आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
इसके बाद महिला ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 सीआरपीसी के तहत स्वेच्छा से बयान दर्ज कराए और अपने आरोपों का समर्थन किया। धारा 164 के बयान बंद कमरे में बिना पुलिस या बाहरी व्यक्ति की मौजूदगी के दर्ज किए जाते हैं।
कोर्ट में बदल गए बयान
जब मामला अपर सत्र न्यायालय धरमपुरी में ट्रायल पर आया तो 7 अगस्त 2018 को गवाही के दौरान आयशा बी अपने सभी पुराने बयानों से मुकर गई। कोर्ट में शपथ पर बयान देते हुए महिला ने कहा कि वह आरोपितों को नहीं पहचानती और उसने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई थी। महिला ने यह भी कहा कि उसने मजिस्ट्रेट के सामने बयान पति के डर और दबाव में दिए थे।
कोर्ट ने माना- न्याय प्रणाली का अपमान
न्यायिक मजिस्ट्रेट विवेक जैन ने फैसले में कहा कि महिला विभिन्न स्तरों पर एक जैसे बयान देती रही और बाद में कोर्ट में मुकर गई। न्यायालय ने माना कि महिला ने छह लोगों के खिलाफ बलात्कार की गंभीर रिपोर्ट दर्ज कराई, आरोपितों को जेल भिजवाया और बाद में मुकरकर न्यायालयीन कार्यवाही की शुचिता को दूषित करने का प्रयास किया, जिससे समाज में गलत संदेश जाता है। कोर्ट ने महिला को परिवीक्षा का लाभ देने से भी इनकार कर दिया।
सजा का विवरण
न्यायालय ने पारित आदेश में दोषी आयशा बी को धारा 193 आईपीसी के तहत 3 वर्ष सश्रम कारावास और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना जमा नहीं करने की स्थिति में 30 दिन का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा। दोषी को जेल भेजने का वारंट भी जारी कर दिया गया है।
क्यों अहम है यह फैसला
धारा 193 आईपीसी झूठी गवाही और झूठे साक्ष्य तैयार करने से संबंधित है। इसमें 7 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। न्यायालय का यह फैसला उन लोगों के लिए नजीर माना जा रहा है जो निजी रंजिश या अन्य कारणों से गंभीर धाराओं का दुरुपयोग करते हैं।







