श्रेया न्यूज़ द्रोपती धुर्वे शहडोल :- बालाघाट। खोखली विचारधारा की आड़ में दशकों तक बालाघाट को लाल आतंक के साये में रखने वाले माओवादी अब खुद को बदल रहे हैं। ये बदलाव सुखद अहसास करा रहा है। कौशल विकास, उनके जीवन को नया दिशा दे रही है। 11 दिसंबर 2025 को माओवादी हिंसा से मुक्त होने के बाद बालाघाट पुलिस हथियार त्यागने वाले माओवादियों को समाज की मुख्यधारा में लाने उनका कौशल विकास कर रही है।
सरेंडर करने वाले 10 माओवादी इन दिनों रक्षित केंद्र (पुलिस लाइन) में सिलाई और ड्राइविंग सीख रहे हैं। जिन हाथों में कभी बंदूकें थीं, जिनके हाथ खून से रंगे थे, वो अब सिलाई मशीन चला रहे हैं। उपनिरीक्षक राजाराम विश्वकर्मा के नेतृत्व में पांच पुरुष और पांच महिला माओवादी शर्ट-पेंट सिलने की बारीकियां सीख रहे हैं।
मुखबिरी के शक में कर दी थी हत्या
राजाराम ने बताया कि करीब डेढ़ महीने से उन्हें सिलाई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि अपने-अपने घर लौटने के बाद स्वरोजगार कर सकें। इसके अलावा, पुलिस ने उन 14 परिवारों के सदस्यों से मीडिया को रूबरू कराया, जिनके स्वजन की कभी माओवादियों ने मुखबिरी के शक में हत्या कर दी थी।
ऐसे परिवारों के एक-एक सदस्य को बालाघाट पुलिस ने विभाग में आरक्षक के पद पर स्थाई नौकरी देकर हिंसा के शिकार परिवार को संबल दिया है। सभी 14 नवआरक्षक इन दिनों पुलिस लाइन में रहकर विभागीय कार्यों और दायित्वों के बारे में प्रशिक्षण ले रहे हैं।
पुलिस जवानों की वर्दी बनाएंगे माओवादी, मिलेगा मानदेय
उपनिरीक्षक विश्वकर्मा ने बताया कि प्रत्येक माओवादी को एक-एक सिलाई मशीन दी गई है। शुरुआत में मुश्किल हुई, लेकिन अब आसानी से सिलाई करना सीख रहे हैं। हम अभी शर्ट-पेंट सिलना सिखा रहे हैं। भविष्य में पुलिस की वर्दी या बच्चों के गणवेश सिलवाने की तैयारी है। विशेष सहयोगी दस्ता दल के जवानों के लिए भी यहीं से कपड़े सिलने की योजना है। मानदेय भी दिया जाएगा। शुरुआत में भाषा अड़चन बन रही थी अब सब ठीक है।







