श्रेया न्यूज़ शहडोल नीलू राठौर :- शहडोल पंडित शम्भूनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग एवं इतिहास संकलन समिति महाकोशल प्रांत द्वारा एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन मंगलवार को किया गया। संगोष्ठी का विषय भारतीय इतिहास परम्परा में रव की अवधारणा एवं आत्मबोध रहा, जिस पर देश के प्रतिष्ठित इतिहासकारों एवं विद्वानों ने गहन विमर्श प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो ईश्वर शरण बिश्वकर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय इतिहास परम्परा में ‘स्व’ केवल आत्मकेंद्रितु भाव नहीं, बल्कि समाज, राष्ट्र और समष्टि से जुड़ी चेतना है। आत्मबोध भारतीय दर्शन की वह धुरी है, जिसने व्यक्ति को कर्तव्य, मर्यादा और लोकमंगल से जोड़े रखा है।
प्रो ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने इतिहास लेखन में भारतीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखने पर बल दिया। अध्यक्षता कर रहे कुलगुरु प्रो. रामशंकर ने कहा कि भारतीय इतिहास की आत्मा आत्मबोध में निहित है। यदि हम अपनी ऐतिहासिक परंपराओं को आत्मगीरव के साथ समझें, तो वर्तमान की अनेक चुनौतियों का समाधान सहज ही संभव है। विशिष्ट अतिथि एवं इतिहास संक्लन समिति, महाकोशल प्रांत के अध्यक्ष प्रो.
कपिल देव मिश्रा ने कहा कि भारतीय इतिहास परंपरा आत्मकेंद्रित न होकर आत्म साक्षात्कार की परंपरा है, जिसमें व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र तक की चेतना विकसित होती हैं। महाकोशल प्रांत के ही डा शिवकांत त्रिपाठी ने आत्मबोध को क भारतीय इतिहास की निरंतरता का अ आधार बताते हुए कहा कि यही तत्य ति भारत को सांस्कृतिक रूप से अक्षुण्य प्रस बनाए रखता है।
सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित स्थित आइजीएनटीयू अमरकंटक के एसोसिएट प्रोफेसर ने भारतीय इतिहास के दार्शनिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘स्व’ की अवधारणा भारतीय ज्ञान परम्परा को वैश्विक स्तर पर विशिष्ट बनाती है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव पो आशीष तिवारी ने अपने संबोधन में संगोष्ठी को अकादमिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन विश्वविद्यालय के बौद्धिक परिवेश को समृद्ध करते हैं और शोधार्थियों को नई दृष्टि प्रदान करते हैं।







