श्रेया न्यूज़ शहडोल नीलू राठौर :- जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों के बाद यदि किसी कारणवश शादी नहीं हो पाती या आरोपित शादी से इनकार कर देता है, तो केवल इसी आधार पर उसे दुष्कर्म या आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कठोर कारावास की सजा निरस्त कर दी
न्यायमूर्ति राजेंद्र कुमार वानी की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए सीधी जिले के एक आरोपित को दुष्कर्म और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषमुक्त कर दिया व अधीनस्थ अदालत द्वारा सुनाई गई 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा निरस्त कर दी।
क्या था मामला
अभियोजन के अनुसार 10 फरवरी, 2020 को सीधी जिले की युवती घर से चारा और सब्जी लेने निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। 12 फरवरी को उसका शव मझौली थाना क्षेत्र में अरहर के खेत में पेड़ से लटका मिला।
आहत होकर युवती ने आत्महत्या कर ली
आरोप था कि आरोपित ने शादी का वादा कर संबंध बनाए और बाद में शादी से इनकार कर दिया, जिससे आहत होकर युवती ने आत्महत्या कर ली।
अधीनस्थ अदालत ने सुनाई थी सजा
प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, सीधी ने 28 जून 2025 को आरोपी को आईपीसी की धारा 376(1) और 306 के तहत दोषी ठहराते हुए 10-10 वर्ष के कठोर कारावास एवं एक-एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके विरुद्ध आरोपित ने आठ जुलाई, 2025 को हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
- सुनवाई में यह तथ्य भी सामने आया कि मृतका के स्वजन दोनों के प्रेम संबंध से परिचित थे और उन्हें इस रिश्ते पर कोई आपत्ति नहीं थी।
- अदालत ने कहा कि रिकार्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो कि आरोपित ने शुरू से ही धोखे की नीयत से शादी का झूठा वादा किया था।
- यदि विवाह का प्रस्ताव प्रारंभ में वास्तविक था और बाद में परिस्थितियों के कारण विवाह नहीं हो सका, तो इसे बलात्कार नहीं माना जा सकता।
- कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल शादी से इनकार कर देना आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनाता। आरोपित के आचरण और आत्महत्या के बीच प्रत्यक्ष उकसावे का संबंध साबित होना आवश्यक है।
संदेह का लाभ आरोपित को
हाई कोर्ट ने आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि जब उपलब्ध साक्ष्यों से दो संभावनाएं बनती हों, तो आरोपी के पक्ष वाली संभावना को स्वीकार किया जाना चाहिए। चूंकि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका, इसलिए आरोपी को दोषमुक्त कर उसकी सजा निरस्त कर दी गई।
प्वाइंटर
- दो बालिगों के बीच सहमति से बने संबंध अपने आप में रेप नहीं।
- शादी न होने या इनकार मात्र से रेप का अपराध सिद्ध नहीं होगा।
- शुरुआत से धोखाधड़ी की मंशा साबित करना अभियोजन की जिम्मेदारी।
- शादी से इनकार मात्र आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं।
- साक्ष्य संदेह से परे न होने पर आरोपित को मिला दोषमुक्ति का लाभ।







