श्रेया न्यूज़ शहडोल नीलू राठौर :- शहडोल जिस स्कूल की चौखट पर मां-बाप अपनी नन्हीं परियों को सुनहरे भविष्य के सपने देकर भेजते हैं, वही शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल बरगवां 24 आज मासूमों के लिए ‘रक्त रंजित खौफ’ का अड्डा बन चुका है। महज 48 घंटे के भीतर दो-दो मासूम बेटियों के चीत्कार से स्कूल का आंगन दहल उठा। 9 साल की नन्हीं गायत्री प्रजापति जब खून से लथपथ होकर जमीन पर तड़प रही थी, तब शिक्षा के मंदिर की दीवारें भी शर्मसार हो गईं।
लेकिन इस भयानक दर्द के पीछे सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रिंसिपल महेश सिंह की अंतहीन लालच, घोर संवेदनहीनता और सरकारी पैसों की लूट का वो घिनौना सच है, जिसने एक मासूम की सांसें अटका दी थीं।
मासूम गायत्री की बहती चीखें और पिता का बिलखता दिल पीड़ित पिता सोमनाथ प्रजापति की भीगी आंखें और थरथराते हाथ आज हर संवेदनशील इंसान से सवाल कर रहे हैं। उस मंजर को याद कर पूरा गांव सिहर उठता है—जब नुकीले मलबे और बिखरी टाइल्स ने गायत्री के मासूम जिस्म को चीर दिया था।
अत्यधिक रक्तस्राव से तड़पती बच्ची का चेहरा देखकर पिता का कलेजा मुंह को आ गया। आक्रोश से भरे पिता ने रुंधे गले से पूछा:
“हम गरीबों की बेटियों का खून इतना सस्ता है क्या? शासन हर साल लाखों रुपये मरम्मत और सुरक्षा के लिए भेजता है, लेकिन प्रिंसिपल महेश सिंह ने उस पैसे से अपनी तिजोरी भरी या बच्चों की सुरक्षा की? अगर वो सरकारी बजट कागजों में न हजम हुआ होता, तो आज मेरी फूल जैसी बेटी अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी की जंग न लड़ रही होती।”
‘एक शाला, एक परिसर’ बना मासूमों का कसाईखाना!
शासन ने ‘एक शाला, एक परिसर’ की संकल्पना इसलिए की थी ताकि प्राथमिक से लेकर उच्च कक्षाओं तक के बच्चों को एक सुरक्षित और समृद्ध माहौल मिले। लेकिन बरगवां 24 में प्रिंसिपल महेश सिंह की देखरेख में यह योजना ‘एक परिसर, भ्रष्टाचार का एक कसाईखाना’ साबित हो रही है। बजट की बंदरबांट और फर्जी बिल-वाउचरों के दम पर कागजों में चमचमाती फाइलें तैयार कर ली गईं, लेकिन जमीन पर छोड़ दिया गया जानलेवा मलबा और उखड़ी हुई घातक टाइल्स। बड़ी कक्षाओं के साथ एक ही परिसर में रहने वाले नन्हें-मुन्ने बच्चों को उस खौफनाक माहौल में मरने के लिए छोड़ दिया गया।













