श्रेया न्यूज़ शहडोल द्रोपती धुर्वे :- उमरियाः उमरिया जैसे छोटे और आदिवासी जिले में दवाइयों की ज्यादा जानकारी नहीं होने के कारण लोग बेमतलब और बेवजह की एंटीबायोटिक दवाएं खा रहे हैं। इन्हें यह एंटीबायोटिक दवाएं या तो निजी अस्पताल के डाक्टर खिला रहे हैं या फिर झोलाछाप। उमरिया जिले में – झोलाछापों की संख्या बेहद ज्यादा है और ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते उपचार के चक्कर में गांव के लोग इनके झांसे में फंस जाते हैं। हैवी और ज्यादा मात्रा में एंटीबायोटिक देने के कारण रोगों में जल्दी आराम मिलने लगता है और दवाइयों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखने वाले ग्रामीण खुश भी हो जाते हैं।
कम मात्रा में देनी चाहिए एंटीबायोटिकः डा मुकुल तिवारी का कहना है कि किसी भी बीमारी के लिए उसके अनुरूप मरीज को सबसे सटीक एंटीबायोटिक दिया जाना चाहिए। लेकिन कई बार मरीज को जल्दी ठीक करने के दबाव में या उपयुक्त जांच इत्यादि न होने की स्थिति में डाक्टर मरीज को किसी बीमारी के लिए लार्ज स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स (ऐसे एंटीबायोटिक्स जो कई तरह के विषाणुओं को नष्ट करते हैं) देते हैं। जबकि इन्हें देने की आवश्यकता नहीं होती। यह स्थिति त्तब निर्मित होती है जब मरीज गलत डाक्टर अथवा उन लोगों के पा पहुंच जाते हैं जो वास्तव में डाक्टर होते ही नहीं हैं।
मरीज भी डालते हैं दबावः कई बार मरीज भी डाक्टर से एंटीबायोटिक दिए जाने की मांग करते हैं, जिसके कारण डाक्टरों को उन्हें एंटीबायोटिक लिखनी पड़ती है। कई डाक्टर वायरल इन्फेक्शन में भी मरीज को एंटीबायोटिक्स देते हैं, जबकि इसकी बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती। यही नहीं, डाक्टर भी कई बार मरीज को एंटीबायोटिक्स की उचित डोज नहीं देते, वो इलाज जल्दी बंद कर देते हैं, जबकि पूरी डोज देनी चाहिए। डाक्टरों द्वारा एंटीबायोटिक्स के दुरुपयोग को लेकर गंभीरता बरतने की आवश्यकता है। सीएस डा केसी सोनी का कहना है कि जिला अस्पताल में मरीजों को निर्धारित मात्रा में ही एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती है।






