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May 7, 2025

रेडियो पर आवाज गूंजते ही गलियों में छा जाता था अंधेरा : देवलिया सांझ ढलते ही रेडियो पर आवाज़ गूंजती थी, ब्लैकआउट लागू कर दिया गया है, कृपया सभी लाइटें बुझा दें। और फिर क्या, पूरा मोहल्ला जैसे अंधेरे की चादर ओढ़ लेता था। यह कहते हुए 74 वर्षीय गोविंद देवलिया की आँखें 1971 की उन युद्ध-भरी रातों में खो जाती हैं। स्थानीय इतिहासकार देवलिया बताते हैं, उस समय सूचना का प्रमुख साधन रेडियो था। आकाशवाणी की आवाज़ में वह गंभीरता होती थी कि बच्चे भी चुप हो जाते थे। ब्लैक आउट से पहले दिन में कोतवाली पुलिस के जवान तांगे पर सवार होकर शहर के विभिन्न मोहल्लों में माइक से एनाउंस करते थे कि आज ब्लैक आउट होने वाला है। देवलिया के मुताबिक उस वक्त घरों की लाइट देशभक्ति का प्रतीक बन गया था। हर घर में खिड़कियों पर गीले बोरे या मोटे कंबल लटका दिए जाते थे, ताकि कहीं से भी रोशनी बाहर न झाँके। लोग टार्च तक का प्रयोग नहीं करते थे, और लालटेन भी अखबार से ढँकी जाती थी। वे याद करते हुए बताते है कि हमें डर तो लगता था, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा गर्व होता था कि हम देश के लिए कुछ कर रहे हैं। वे बताते है कि उस समय यदि किसी घर की लाइट जल जाती थी तो पड़ोसी फौरन जाकर याद दिलाते थे कि भाईसाहब, ब्लैकआउट चल रहा है। उस समय न शिकायत थी, न बहस, बस समझदारी और सहयोग था। देवलिया के मुताबिक 1971 में वे कालेज में द्वितीय वर्ष के छात्र थे। वे अपने दोस्तों के साथ साइकिल से घर – घर जाकर लोगों को जागरूक करते थे। तब लोग बात मानते थे। वे कहते है कि आज जब मोबाइल की फ्लैशलाइट बंद करने में लोग सोचते हैं, तब हमें वो दिन याद आते हैं जब पूरा शहर देश के लिए खुशी – खुशी एक साथ अंधेरे में डूब जाता था। naidunia_image सुरेश अरोड़ा, ग्‍वालियर पूरे घर की खिड़की, दरवाजे, बंद कर लेते थे सुरेश अरोड़ा, निवासी हरिशंकरपुरम, ग्वालियर 1971 में भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ था, जब पूर्वी पाकिस्तान से आजाद होकर बांग्लादेश बना था। मेरा जन्म 1960 का है। ग्वालियर के हरिशंकरपुरम निवासी सुरेश अरोड़ा बताते हैं कि मैं उस समय अविभाजित मध्यप्रदेश के ग्वालियर में ही रहता था। लेकिन करीब करीब नवंबर के आख़िरी सप्ताह में मैं अपने दादाजी के पास मुरादाबाद गया था। मैं लगभग ग्यारह वर्ष का था। अब तक याद है, दिसंबर की शुरुआत में ही रेडियो पर जंग की ख़बर सुनी थी। इसी दौरान रोज़ शाम 7 बजे ब्लैक आउट की घोषणा हुई थी। जैसे ही शाम 7 बजते थे तो सायरन बजता था। यह अलर्ट वाला सायरन होता था। पूरे घर की खिड़की, दरवाजे, बंद कर लेते थे। पूरे घर में आज की तरह बिजली नहीं होती थी, एक या दो बल्ब ही होते थे। उन्हें बंद कर देते थे। घर के अंदर छोटी सी चिमनी चालू रहती थी। वो भी उसकी रोशनी घर के बाहर न जाए। ऐसा करीब करीब बीस दिन चला था। अब मैं 65 साल का हो गया हूँ। अब दोबारा ब्लैक आउट होने जा रहा है।

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